भाजपा के दो बड़े नेताओं के आप में शामिल होने की चर्चाओं का बाजार गर्म
लोक सभा चुनावों में भाजपा को उठाना पड़ सकता है माझा व दोआबा में बडा नुक्सान
चण्ड़ीगढ़,(राकेश राणा): जैसे-जैसे देश में लोक सभा के चुनावों का समय नजदीक आता जा रहा है, वैसे-वैसे नेताओं के भी मन बदलने शुरू होने लगे हैं। देश के विभिन्न राज्यों में जहां भाजपा में अन्य पार्टियों के लोग शामिल हो रहे हैं, वहीं पर ही पंजाब में भी विभिन्न तरह की चर्चा होनी शुरू हो गई है। आऐ दिन कोई ना कोई नई चर्चा बाजार में पढऩे व सुनने को मिल रही हैं। मौजूदा समय में पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के नेतृत्व में कार्य कर रही है। जिसने गत वर्ष 2022 में हुए विधान सभा के चुनावों में 117 में से 92 विधान सभाओं में विजय पतका फहरा कर एक ईतिहास बनाया था। जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं व नेताओं के हौसले बुलंदियों पर है। पंजाब के लोगों ने आप पार्टी को उम्मीद से कही अधिक विधायक दे कर भगवंत सिंह मान पर विशवास जताते हुए आप मुख्यिा अरविंद केजरीवाल की सोच को आगे बढ़ाने का कार्य किया था। अब लोक सभा के चुनावों को देखते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान पहले ही कह चुके हैं कि आप 13-0 से सभी पार्टियों को पिछे छोड़ती हुई एक बार फिर से पंजाब में ईतिहास बनाएगी। लगता है उस पर आम आदमी पार्टी ने कार्य करना अन्दर खाते शुरू कर दिया हुआ है। पंजाब में चल रही इस समय चर्चाओं पर विश्वास किया जाए तो आम आदमी पार्टी भारतीय जनता पार्टी को माझा व दोआबा में दो बड़े झटके दे सकती है, क्योंकि भाजपा के दो बड़े नेता आप के सपंर्क में बताए जाते हैं। सूत्रों पर यदि विशवास करे व चर्चाओं की माने तो माझा से भाजपा के एक बड़े नेता के सुर पिछले कुछ समय से बदले हुए हैं और वह तरह-तरह के ब्यान दे कर भाजपा को आगाह भी कर रहे हैं कि यदि उन्हें इस बार लोक सभा में टिकट नहीं दिया गया तो वह बे-मुँख भी हो सकते हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि एक कार्यक्रम में माझा के उक्त नेता कमल का फूल छोड़ कर झाडू को थाम सकते हैं। उधर यदि दबी जुबान में हो रही चर्चाओं पर विश्वास करें तो दोआबा के एक बहुत बड़े नेता भी यदि कमल का फूल छोड़ कर झाडू को थाम ले तो कोई अश्चर्य नहीं होगा, लेकिन भाजपा के लिए वह एक बहुत बड़ा झटका हो सकता है। जिससे भाजपा को लोक सभा के चुनावों में उभरना मुश्किल हो सकता है और जिसका भाजपा को नुक्सान भी उठाना पड़ सकता है क्योंकि उक्त नेता को भी आभास होने लगा है कि अब शायद भाजपा में उनकी दाल गलने वाली नहीं है। दोआबा के उक्त भाजपा के नेता का अपना एक बड़ा जनाधार है। यदि उक्त नेता अपनी वफादारी बदलते हैं तो भाजपा के लिए दोआबा में भी अपनी नैय्या पार लगाना बहुत मुश्किल हो सकता है। राजनीति में किसी भी संभावना से इंनकार नहीं किया जा सकता, चर्चा तो यह भी है कि कहीं, उक्त भाजपा नेता अपनी पार्टी पर दबाब बनाने के लिए तो नहीं ऐसी चर्चाएं छोड़ रहे, तांकि उनका भार बढ़ सके व वह अपनी पार्टी से कोई सौदेबाजी कर सकें। अब आने वाले दिनों में देखना होगा कि क्या चल रही चर्चाएं सही हैं या फिर लोक सभा चुनावों को देखते हुए मात्र चर्चाएं ही है।

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